Friday, 25 January 2013

कोशिश...


ओह माँ !!!
हमें माफ़ करना 
हमने धारणा से
संकल्प पैदा करना चाहा
हमने अवमानना से 
समर्पण पैदा करना चाहा
हम हिन्दू बने रहे 
हम मुसलमान बने रहे 
हम जैन बने रहे


हम बंटते रहे 
और
लुटते रहे 
और
चूक होती गयी
हम से 
तेरी साज सम्हाल में
अचानक
तेरी पुकार
सुन 
हम भागे.... हम भागे आये हैं 
हमे समेत ले 
अपने अंक में 
हम सारे विशेषण 
छोड़ आये हैं
निर्वसन , निर्धारणा 
अब हमेमिटना है
खोना है 
तुझमे ही समाहित होना है 
अब हमे "आम आदमी " होना है.....

"तो ???"


' तो ? ' ये तेरा सवाल है 
तेरे पास होंगे कारण 
तेरे पास होंगी वजहें कई 
तेरी वजहों में, तेरो बातो में 
बड़ी आतुरता है 
हैं बड़ी जल्दबाजी
और बेचैनी 
चेष्टाएं 
दौड़ धूप 
बस अगर कुछ नही है तो 
वो है समझ 
 
हाँ ! मान ले नही है
तुझमे समझ 
ये 
समझने की 
की कुछ चीजे
हाथ से नही
प्रतीक्षा से मिलती हैं 
तूने दिया जो
निमंत्रण
स्वीकारेगा 
आवेगा अतिथि 
रखना खुले द्वार.....

Tuesday, 22 January 2013

सपनीले


सुनो प्रिय 
अब भी मै इकट्ठे करती हूँ लजीले किसलय 
अब भी मेरी आदत फूलो को सहलाने की 
रेत से ढूंढ लाये थे जो 
तुम
सपनीले सफ़ेद पत्थर 
अब भी बाँध रखे हैं मैंने दुपट्टे
 के कोने से 


मौन के गाँव....!!!


अब के जब....
लौट के आओगे तुम....
हाथ थामे तुम्हारा....
चलेंगे...
छिप कर सबसे...
बाजार के...
पीछे वाली गली से....
ढलान वाली सड़क से उतरकर....
ढूंढेंगे नया इक गाँव....
सुनो वो जंगल के चरमराते पत्ते....
बता सकते हैं हमे आगे जाने का रास्ता....
जहा से लौट पड़े थे हम पिछली दफा .....
झुरमुटो से निकल कर.....
उधर टीलों की बस्ती.... आगे ही मिलेगा ....
मौन का गाँव....
जहा गीत रहता है.....
ले चलोगे न?