Friday, 1 February 2013

व्यापार


हम आग बेचने निकले हैं...
बोलो खरीदोगे???
जहर बुझा गुस्सा...
बंधा है पोटली में....
नफरते तोला भर....
बोलो खरीदोगे???

सारे ताम झाम छोड़ के...
तिनका तिनका चिनगारिया....
बटोरी हैं,
हाँ मोल भाव तुम मत करना...
बेपरवाह हैं हम....
नही भी बेचेंगे...
छटांक भर जिन्दगी.... 
लिए बिना....

बोलो खरीदोगे ??? 
नही न?

1 comment:

  1. इस 'आग' की
    'तपन' से ,
    'धुंवे' 'के'
    घुटन से ,
    याद आती हे ,
    हमको एक राजकुमारी,
    (झाँसी की रानी )
    ना हे हमारे पास हे
    कोई सेना,
    ना हे हम
    कोई सेनापति,
    ना हे कोई
    खजाना ,
    जिससे
    खरीद सके इसको,
    ना हे कोई झोली
    जंहा रख सके इसको,
    तो क्यूँ ना
    इस सर्दी में,
    दूर खड़े रहकर
    सके लिए
    जाय हाथ हमारे !!

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