Sunday, 17 March 2013

रास्ते




मैंने सोचा
मैं मंजिल को जाती हूँ
फिर सोचा, नही;
मैं रास्तो से जाती हूँ
किसी ने कहा
दूरी है, वेग चाहिए
किसी ने कहा
पास ही
मंथर ही चल
मगर, जो समझा 
तो चौंक पड़ी
मंजिल दूर नही कि
चलने से मिल जाये
बेवजह दौड़ लगाई  मैंने
हा!
साँसे उखड़ने लगी थी
अब तो
और
अब तक
मेरे भीतर
ठहरी
मेरे चलने से चूक गयी
मंजिल
जब ठहर गई
तो पा लिया |   


1 comment:

  1. हमने कब रास्तों से हटाये कदम
    हमने कब मंजिलों को पुकारा ना था
    फिर भी,
    पास आकर पलटना पड़ा,
    तेरी जानिब से कोई इशारा ना था ...............!
    ------ नीरज गुप्ता

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