तुम्हारे लिए
रिचार्ज रखती हूँ अपना मोबाइल
तमाम टैरिफ और टॉपअप के साथ
और बार बार खोलकर फोनबुक
तुम्हारा नाम और नम्बर
करती हूँ तस्दीक
तो
कभी काल हिस्ट्री में जाकर
झांक लेती हूँ
कितने पल लिखे थे
तुमने मेरे नाम पिछली दफा
और
समेट कर छिपा लेती हूँ
कि
कहीं डिलीट बटन न दब जाय
गलती से
और
ख़तम हो जाएँ हमारी
प्यारी बातो के लम्हे
न न ऐसा नही है
डायल भी किया है कई बार
मगर
रिंग जाने से पहले ही
धड़कने हो जाती हैं बेकाबू
और
सिहर कर
दबा देती हूँ
डिसकनेक्ट का बटन
और खींच लती हु बार बार खुद को दूर तुमसे
जिससे इत्मिनान से
अपनी साँसों में
महसूस कर सकू तुम्हे........................ .

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