Wednesday, 17 June 2015

क्षणिकाएं ३

१...

जागती आँखों के सपने... जैसे मालाबार तट पर आती जाती लहरें 
बेचैन समंदर के लिए भी नींद एक गैरजरूरी शय है, तुम्हारी मानिंद ...

२...

वक़्त पड़ा है, काम आये कोई
चाहे तो, नींद उधार ले जाए कोई...

३...

चाँद की दो फांक वाली, बालियाँ मांगी थी मैंने
वो ऐसा कंजूस था कि गुस्सा दिला के बढ़ लिया!

४...

एक तीली मेरे पास कम है...
इसीलिए ये दुनिया कायम है...

५...

जाओ
एक बार फिर 
चले जाओ
कम से कम
मुझे 
मेरी कविताओं में तो
अकेला छोड़ दो!!!


५..

"पहला" मैदान पर उतरता बस है। smile emoticon
"दूसरा" आये तो खेला शुरू करता है। grin emoticon
"तीसरा" अक्सर खेल बिगड़ता है। unsure emoticon
"चौथा" खेल ख़त्म होने के बाद आता है। cry emoticon

फुर्सत में

एक दिन जब कोई काम नहीं होता... बेवजह दो आंसू रोने की फुर्सत मिल जाती है। अरे अब भला हंसने का कोई कारण हुआ है कभी... न ही मिली है अब तक रोने की वजह। लिखा हुआ कुछ दिल में हैं ... कुछ आँखों में जो लिखने से चूक गया। रोशनाई बहती जरुर है... पर प्यास नहीं मिटा पाती। हरे कागजों के लिए , सफ़ेद कागजो को लिए बस खर्च होती जाती है। एक मशरूफ रात एक आरामतलब दिन से कहीं अच्छी है। बातो के हिज्जे नमकदार हैं । किस्से खर्च हो चुके हैं। कोई सुन ले तो बहुत कुछ कहना है मुझे...

अफवाहें

उस पार, वो बड़ी देर से सोच में बैठे हैं । किसी ने उनसे कह दिया है कि खत्म होने वाली हैं औरतें इस जहाँ से। वो सहमे से बैठे हैं उन्होंने तीन क़त्ल करवाई हैं बीते 21 महीनों में। धंधेबाज हैं, नया बिजनेस आईडिया ढूंढ लेते हैं इसमें भी। कालाबाजारी कर लो... थोक में ब्याह लो अधिक से अधिक। बाद में मोलभाव करके देख लेंगे।
इस पार कुछ और ही चल रहा है। उन्हें नहीं मालूम औरतें बड़ी जीवट हैं। अलग ही तरह का जंतु हैं । कभी न मरने वाली ... रक्ताभ चट्टानों की ईजाद। कोई नींद का फसाद बता उन्हें। वो ख्वाब में हैं और औरते रक्त में सनी सांस लेती हुई, अपनी पिछली पिधिनकी कोख में; कभी न रुकने वाली धडकनों के साथ।
ये फ़कत एक अफ़वाह है कि औरतों ने ये ग्रह छोड़ने का निश्चय किया है। वो कभी ख़त्म होने वाली नहीं हैं।

क्षणिकाएं २

१...

मैंने सौ किताबें पढ़ीं, एक से बढकर एक

माँ ने बस इक बात कही, रहना नेक इरादे टेक


२...


उम्मीद थी तुम पत्थर हो,

अफ़सोस है तुम रेत निकली।

३...

समन्दर कितना बेसुरा है... चिंघाड़ता है, जैसे मौत रूबरू हो...
जाने कैसे कवि हो तुम... डर के गीत भी लिख देते हो।


४...

तूने भी लिख दिया हमें 
हम भी तुझे किस्सों में छोड़ आये


५...

धरती हो गयी हूँ ...
चकराई सी घूमती हूँ... 
अपने ही चारों ओर... 
थकती हूँ... थमती नहीं।

one lilners

1.मुस्कुराते हुए चेहरे सबसे ज्यादा झूठ बोलते हैं।
2. आत्ममुग्धा... अग्निधर्मा... शेष भ्रान्ति... मृदा मैं!!!

तुम

सुबह की रौशनी में तुम्हारी रोशन आवाज सुनना। सुर्ख सुर्ख़ियों में तुम्हारी कवितायें ढूंढना। चबा जाना तुम्हारी बातों को सुबह के नाश्ते में। खिलखिलाहटें उबालकर छानकर ढँक देना। इंतजार तुम्हारी दोपहर का जो चार बजे हुआ करती है। चावलों को सब्जी की कलछी से निकाल देखना सफ़ेद और पीले चावलों में अंतर। सुना है रजामंदियाँ केसरिया रंग की होती हैं । बातें सब सूखने को छत पर डालकर भूल आते हो रोज... समेटती दिखती है वो नाजुक हाथो से। चूड़ियों काशिकायतों में खनखनाने की आदत का छूट जाना । कुछ भी खाने जैसी भूख को हजम करते हुए घंटो तुम्हें निहारने की ख्वाहिशों को तह करना। तुम्हारे जाने से तुम्हारे आने के बीच सौ बार तुम्हे याद करना। किश्तें इश्क़ की सब राजी होकर खड़ी हैं बालकनी में। जूते पहन लो और चलो तुम भी । जरुरी है हर सुबह के पहले रात का आना। इक तुम ही नहीं आते... ये शिकायते करना और पिछली होली का वादा भी भूल जाना।

दिन भर

तमाम जिम्मेदारियां और जरूरते पूरी करते
बिखरे बर्तनों और कपड़ों के ढेर से उखडकर
आधे जिगर की खुली बाहें ठुकराकर
चढ़ते सूरज के साथ, चढ़ती हूँ रफ़्तार के परों पर
छूटकर मशक्कतों के पंजे से, भागती दौड़ती
हर शाम जब लौटती हूँ अस्तव्यस्त घोसले में
मेरे जिगर का आधा हिस्सा सो चुका होता है
जी नहीं भरता रात भर निहारकर भी, सोते चाँद को
हाँ मुश्किल है, मुश्किलों से, एक माँ होना
हाँ मुश्किल है, मुश्किलों में, एक माँ होना
©अंजलि चैतन्य
04/02/15