१...
मैंने सौ किताबें पढ़ीं, एक से बढकर एक
माँ ने बस इक बात कही, रहना नेक इरादे टेक
२...
उम्मीद थी तुम पत्थर हो,
अफ़सोस है तुम रेत निकली।
३...
समन्दर कितना बेसुरा है... चिंघाड़ता है, जैसे मौत रूबरू हो...
जाने कैसे कवि हो तुम... डर के गीत भी लिख देते हो।
४...
तूने भी लिख दिया हमें
हम भी तुझे किस्सों में छोड़ आये
५...
धरती हो गयी हूँ ...
चकराई सी घूमती हूँ...
अपने ही चारों ओर...
थकती हूँ... थमती नहीं।
मैंने सौ किताबें पढ़ीं, एक से बढकर एक
माँ ने बस इक बात कही, रहना नेक इरादे टेक
२...
उम्मीद थी तुम पत्थर हो,
अफ़सोस है तुम रेत निकली।
३...
समन्दर कितना बेसुरा है... चिंघाड़ता है, जैसे मौत रूबरू हो...
जाने कैसे कवि हो तुम... डर के गीत भी लिख देते हो।
४...
तूने भी लिख दिया हमें
हम भी तुझे किस्सों में छोड़ आये
५...
धरती हो गयी हूँ ...
चकराई सी घूमती हूँ...
अपने ही चारों ओर...
थकती हूँ... थमती नहीं।
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