Wednesday, 17 June 2015

तुम

सुबह की रौशनी में तुम्हारी रोशन आवाज सुनना। सुर्ख सुर्ख़ियों में तुम्हारी कवितायें ढूंढना। चबा जाना तुम्हारी बातों को सुबह के नाश्ते में। खिलखिलाहटें उबालकर छानकर ढँक देना। इंतजार तुम्हारी दोपहर का जो चार बजे हुआ करती है। चावलों को सब्जी की कलछी से निकाल देखना सफ़ेद और पीले चावलों में अंतर। सुना है रजामंदियाँ केसरिया रंग की होती हैं । बातें सब सूखने को छत पर डालकर भूल आते हो रोज... समेटती दिखती है वो नाजुक हाथो से। चूड़ियों काशिकायतों में खनखनाने की आदत का छूट जाना । कुछ भी खाने जैसी भूख को हजम करते हुए घंटो तुम्हें निहारने की ख्वाहिशों को तह करना। तुम्हारे जाने से तुम्हारे आने के बीच सौ बार तुम्हे याद करना। किश्तें इश्क़ की सब राजी होकर खड़ी हैं बालकनी में। जूते पहन लो और चलो तुम भी । जरुरी है हर सुबह के पहले रात का आना। इक तुम ही नहीं आते... ये शिकायते करना और पिछली होली का वादा भी भूल जाना।

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