रातें
कभी खींचकर
इतनी लम्बी हो जाती हैं
कि
दिन के लिए
समय ही नहीं बचता
और तब
मैं
अपनी आवाज़
को लौटा लाती हूँ
कि
उसकी नींद में
खलल नहीं पड़ना चाहिए
हो सकता है
कि वो कब्र में हो
और
करवट लेने की मनाही हो
हो सकता है कि
वो सब्र में हो
और
मुस्कुराने की ड्यूटी
पर मुस्तैद हो
ऐसे में
उसे
क्यों
उलझन में डालना...
कभी खींचकर
इतनी लम्बी हो जाती हैं
कि
दिन के लिए
समय ही नहीं बचता
और तब
मैं
अपनी आवाज़
को लौटा लाती हूँ
कि
उसकी नींद में
खलल नहीं पड़ना चाहिए
हो सकता है
कि वो कब्र में हो
और
करवट लेने की मनाही हो
हो सकता है कि
वो सब्र में हो
और
मुस्कुराने की ड्यूटी
पर मुस्तैद हो
ऐसे में
उसे
क्यों
उलझन में डालना...
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