Wednesday, 17 June 2015

साँझ लौटकर ...

एक मोटी परत फीकी सी हंसी की
कुछ ओके, कुछ आलराईट...
घिसकर उंगली के पोरों से
छीटे पानी के देती हूँ
एक खीझ पुरानी, एक तजा गुस्सा
कल की जिद और आज का किस्सा
हर रात भिगोकर चेहरे को
जाने क्या घुलने देती हूँ
एक कच्चा सा यकीन
एक टूटा हुआ अधूरा वादा
बहुत कुछ कहा-अनकहा
ये सब मिलाकर
हर रात अपने चेहरे से
कितने मुलम्मे धोती हूँ मैं

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