Wednesday, 17 June 2015

क्षणिकाएं

१...

घास की अनपढ़ी किताबें
ओस की बूंदों से सीली हुई
आते फागुन के साथ
सुनहरी होने लगती थी
और फिर समझ ये कहती थी
बसंत आया, बस अंत आया

२...

वो आतुर हैं किसी और राह मुड़ने को
वो चाहते हैं ऊबड़ खाबड़ रास्तो पर चलना
वो कहते हैं यहाँ बहुत से पाँव है उभरे हुए
वो सोचते हैं वो नहीं गये तो और कौन
वो पहिये जो लीक पर नही चलते


३...


प्यार का किया जाना
या प्यार का हो जाना 
कुछ यूं है, जैसे कब्रें खोद लेना खुद की ही
और पाँव लटकाकर बैठ जाना


४...

प्यार का किया जाना
या प्यार का हो जाना 
कुछ यूं है, जैसे कब्रें खोद लेना खुद की ही
और पाँव लटकाकर बैठ जाना


५...

सपनों में आया
लाल फूलों वाला... सुनहरी गोटे वाला...
बकरियों के पीछे भागती
एक देहातन तितली का फ्रॉक!!!

No comments:

Post a Comment