Wednesday, 17 June 2015

जीती रहो मर्लिन

प्यारी मर्लिन! तुम मर गयी,
एक अरसा पहले
मुझे अफ़सोस होना चाहिए इस बात का
मगर अफ़सोस कि मुझे अफ़सोस नहीं है...
क्यूंकि तुम... मर्लिन!!!
मर्लिन थी और मर्लिन ही रही
कुछ और होने की जरुरत नहीं पड़ी तुम्हे
कभी त्वचा की पहली परत से लेकर
भीतर कूट कर भरा हुआ हुनर
सब इस दुनिया ने देखा
जो नहीं देख पाया, उसका अनदेखा रह जाना
अपने आप में रहस्य है...
मर्लिन!
तुम सबकी रहीं, हर कोई तुम्हारा
हर किसी का होकर भी किसी का न रहना
तुमने पिता बदले, प्रेमी भी
शायद संताने भी बदली हो
तुम्हारे लिए कुछ असंभव नहीं
कोई चाहे तो तुमसे सीख ले
सीख ले कोई तुमसे कि खुबसूरत होना क्या है
सीख ले की वक़्त से निकल कर
कैलेन्डर पर कैसे ढला जाता है
सीख ले प्यास को ज़िंदा रखा जाता है
सीखे... कि एक ही वक़्त कैसे जी जाती है
एक जिंदगी परदे पर और दस असल में
सीख ले कोई तुमसे... बदन से सारे कपड़े उतार कर भी
कैसे ढकी जाती हैं आत्मा की किरचे
मर्लिन!
तुम ही बन सकती थी
दुनिया की पहली औरत
मुझे गर्व है, गर्व है मुझे तुम पर कि
तुमने खुद ही खुद के लिए मौत चुने
शायद इकलौता यही फैसला तुम्हारा अपना था
अपने लिए मरना तय कर लेने से बड़ी बात क्या होगी,
जबकि शौक था तुम्हे बूढी हो जाने का,
झुर्रियों का, भूरे बालो और कमजोर नजर का
तुम... एक ‘मिसफिट’ औरत... ज़िन्दगी में,
बूढी होने का इंतजार तक न कर सकी
एक औरत होकर तुम सौ बार मर सकती थी
मगर तुम सिर्फ एक बार मरी
................और एक ही बार मरकर, ज़िंदा हो हमेशा... हमेशा के लिए!!!

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