हर साल की तरह इस साल भी
ढेर सारे विश्लेषणों से उकताकर
प्रेम नदी की ओर के वीराने देखने निकल गया है
मौसम भी ठहरने की वाजिब वजह न पाकर
सूरतें बदल बैठा है
बदली हुई सूरतें, उघड़े हुए रंग देखकर
एक अजीब सी घुटन होने लगी है
किसी पास बीते बरस का फागुन हो तो
थोड़ा मुझे भी दे दो
...और
तुम आने वाले थे न!
क्या हुआ?
ढेर सारे विश्लेषणों से उकताकर
प्रेम नदी की ओर के वीराने देखने निकल गया है
मौसम भी ठहरने की वाजिब वजह न पाकर
सूरतें बदल बैठा है
बदली हुई सूरतें, उघड़े हुए रंग देखकर
एक अजीब सी घुटन होने लगी है
किसी पास बीते बरस का फागुन हो तो
थोड़ा मुझे भी दे दो
...और
तुम आने वाले थे न!
क्या हुआ?
No comments:
Post a Comment