Wednesday, 17 June 2015

यूँ ही ...

१...

इक क़त्ल है
दो किस्से हैं 
आधा इश्क है 
बिना नींद वाली राते हैं 
कुछ फिजूल सी बाते हैं 
उधार की कुछ किश्ते हैं
उसकी डायरी में हिसाब दर्ज है


२...

अक्षर सब काले हैं 
सदियों से
कितने भी लिखे जाएँ 
नही कम होती
खीझ,गुस्सा,बेचैनी
लिखने वाले मन की
इन्हें सुर्ख होना चाहिए था
ताजे खून के जैसा
सुकून न सही
घिन तो आ जाती

No comments:

Post a Comment