Wednesday, 17 June 2015

दिन भर

तमाम जिम्मेदारियां और जरूरते पूरी करते
बिखरे बर्तनों और कपड़ों के ढेर से उखडकर
आधे जिगर की खुली बाहें ठुकराकर
चढ़ते सूरज के साथ, चढ़ती हूँ रफ़्तार के परों पर
छूटकर मशक्कतों के पंजे से, भागती दौड़ती
हर शाम जब लौटती हूँ अस्तव्यस्त घोसले में
मेरे जिगर का आधा हिस्सा सो चुका होता है
जी नहीं भरता रात भर निहारकर भी, सोते चाँद को
हाँ मुश्किल है, मुश्किलों से, एक माँ होना
हाँ मुश्किल है, मुश्किलों में, एक माँ होना
©अंजलि चैतन्य
04/02/15

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