हर नई चोट पर
और थोडा मलाल कर लेते
काश कि अब भी हम
रो रोकर बच्चों सा हाल कर लेते
और थोडा मलाल कर लेते
काश कि अब भी हम
रो रोकर बच्चों सा हाल कर लेते
चाँद तारे सहेज गुल्लक में
खरचा सूरज का उठाए फिरते
बाद हर सुबह के
खुद को कंगाल कर लेते
खरचा सूरज का उठाए फिरते
बाद हर सुबह के
खुद को कंगाल कर लेते
थामें बैठे हैं
खुद को खुद की बाहों में
तुम जो होते
हम भी कमाल कर लेते
खुद को खुद की बाहों में
तुम जो होते
हम भी कमाल कर लेते
भींच टेसू को अपनी मुट्ठी में
मलते सबके गालों पर
अब के फागुन
खुद को गुलाल कर लेते
मलते सबके गालों पर
अब के फागुन
खुद को गुलाल कर लेते
©अंजलि चैतन्य
07-02-15
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